शाम सिंह सरदार अटारीवाले, बंध-शस्त्र जोड़-विछोड़ फेंक दिए
शाह मुहम्मद कहते हैं, गोरों के जैसे नींबुओं का लहू निचोड़ दिया

पंजाब के इतिहास के महान योद्धा सरदार शाम सिंह अटारीवाला का जन्म नानकशाही संवत 316 (1785 ई.) में सरदार निहाल सिंह के घर माता शमशेर कौर की कोख से हुआ। सरदार शाम सिंह अटारीवाले के पूर्वजों का संबंध जैसलमेर से था। वे पहले फूल मेहराज के गांवों में बसे, फिर सन् 1735 ई. में जगराओं क्षेत्र के कौंके गांव में आकर बस गए। कौंके के बाद एक उदासी संत मूल दास से अमृतसर जिले के एक गांव में भूमि प्राप्त कर ऊँची जगह पर तीन मंज़िला भवन बनवाया गया, जिसका नाम “अटारी” रखा गया।
सरदार शाम सिंह अटारी एक उत्कृष्ट घुड़सवार, तीरंदाज़ और तलवारबाज़ थे। उनके पिता सरदार निहाल सिंह का महाराजा रणजीत सिंह के साथ गहरा स्नेह था। पिता के जीवित रहते ही सरदार शाम सिंह अटारी महाराजा रणजीत सिंह की सेना में भर्ती हो गए थे। 12 मार्च 1816 ई. को उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह से हीरों जड़ी कलगी प्राप्त की। पिता की मृत्यु के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें उनके पिता के पद पर नियुक्त कर दिया।
1818 ई. में मुल्तान की लड़ाई सरदार शाम सिंह द्वारा लड़ी गई पहली प्रमुख लड़ाई थी, जिसमें उन्होंने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया। उनकी बहादुरी से प्रसन्न होकर महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें उसी वर्ष शहज़ादा खड़क सिंह, दल सिंह और मिस्र दीवान चंद के साथ पेशावर अभियान पर भेजा, जिसे खालसा सेना ने सफलतापूर्वक जीत लिया। इसके बाद 1819 में कश्मीर, 1828 में सिंधड़, 1831 में सैयद अहमद बरेलवी पर विजय, 1834 में बन्नू और 1837 में हज़ारा की लड़ाइयों में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई और विजय प्राप्त की।
पेशावर अभियान से लौटने के बाद सरदार शाम सिंह ने अपनी पुत्री नानकी का विवाह महाराजा रणजीत सिंह के पोते कंवर नौ निहाल सिंह से तय किया। 7 मार्च 1837 को अटारी में यह विवाह सम्पन्न हुआ, जो पंजाब के इतिहास का सबसे भव्य और शाही विवाह माना जाता है।
27 जून 1839 को महाराजा रणजीत सिंह के निधन के बाद सिख राज्य का पतन आरंभ हो गया। अंग्रेज़ों ने पंजाब पर कब्ज़ा जमाना शुरू किया और डोगरा शासन स्थापित हो गया। गद्दारियों और षड्यंत्रों का दौर शुरू हुआ। पहले आंग्ल-सिख युद्ध में अंग्रेज़ों की सेना में 44,000 सैनिक और 100 तोपें थीं। सिख सेना के सेनापति तेजा सिंह और वज़ीर लाल सिंह थे, जिन्होंने लालच में आकर अंग्रेज़ों से मिलकर सिख सेना की योजनाओं को विफल कर दिया।
महारानी जिंद कौर के नेतृत्व में लाहौर दरबार चला रहा था। जब सिख सेनाएँ गद्दारी के कारण मुदकी और फिरोज़शहर की लड़ाइयाँ हार गईं, तब महारानी जिंद कौर ने सिख राज्य को बचाने के लिए सरदार शाम सिंह अटारीवाला को सेना की कमान संभालने का संदेश भेजा। पत्र पढ़ते ही सरदार शाम सिंह ने सिर पर कफ़न बाँधा और सबराओं के युद्धक्षेत्र में पहुँच गए।
10 फरवरी 1846 को सबराओं (ज़िला फिरोज़पुर) के युद्ध में उन्होंने ऐलान किया कि वे अंग्रेज़ों को पंजाब की धरती पर पैर नहीं रखने देंगे। भीषण युद्ध हुआ। खालसा सेना ने अद्वितीय शौर्य दिखाया, लेकिन गद्दार जनरलों की साज़िशों के कारण बारूद की जगह रेत और सरसों भेज दी गई। डोगरा जनरलों ने पुल तोड़ दिए, जिससे हज़ारों सिख सैनिक सतलुज में बह गए।
इस घमासान युद्ध में सरदार शाम सिंह अटारीवाले ने वीरता से लड़ते हुए सात गोलियाँ खाईं और अंततः शहादत प्राप्त की। उनकी शहादत के साथ ही सिख सेना, जो विजय के करीब थी, हार गई।
शाह मुहम्मद लिखते हैं:
“हिंद-पंजाब की जंग होने लगी,
दोनों शाही फौजें भारी थीं।
अगर न्याय होता तो क़ीमत पाते,
जो तलवारें खालसा ने चलाई थीं।”
अंग्रेज़ इतिहासकार ग्रिफ़िन लिखते हैं कि सरदार शाम सिंह अटारीवाला जाट वंश के श्रेष्ठ प्रतिनिधियों में से एक थे—ईमानदारी, साहस और वीरता में उनका कोई सानी नहीं था।
सरदार शाम सिंह अटारीवाले का अंतिम संस्कार उनके गांव अटारी में किया गया। आज भी उनकी समाधि वहां मौजूद है। हर वर्ष 10 फरवरी को उनके परिवार और पंजाब सरकार द्वारा राज्य स्तरीय श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जाता है।
इस वर्ष भी 10 फरवरी को
सुबह 10:00 बजे इंडिया गेट (नारायणगढ़–छेहरटा), अमृतसर में उनकी प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी तथा
11:00 बजे अटारी में उनकी समाधि स्थल पर विशेष राज्य स्तरीय समारोह आयोजित होगा।
आइए, हम सभी पंजाब की खातिर अपने प्राण न्योछावर करने वाले इस महान योद्धा सरदार शाम सिंह अटारीवाला की शहादत को नमन करने के लिए 10 फरवरी को अटारी पहुँचें।
इंदरजीत सिंह बाजवा
जिला लोक संपर्क अधिकारी,
अमृतसर
Kalyan Kesari हिन्दी समाचार पत्र