दालों की महत्ता को देखते हुए किसान ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती करें: यादविंदर सिंह

कहा, आलू की खुदाई के बाद बिना किसी खाद के भी की जा सकती है मूंग की खेती

कल्याण केसरी न्यूज़, खडूर साहिब, 14 फरवरी 2026: डायरेक्टर कृषि, पंजाब डॉ. गुरजीत सिंह बराड़ के निर्देशानुसार किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने हेतु विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं। जिले के मुखी डिप्टी कमिश्नर श्री राहुल तथा मुख्य कृषि अधिकारी डॉ. तेजबीर सिंह भंगू के दिशा-निर्देशों के तहत किसानों को गेहूं की कटाई और आलू की खुदाई के बाद ग्रीष्मकालीन दालों की बुवाई के लिए विभिन्न कार्यक्रमों और कैंपों के माध्यम से जागरूक किया जा रहा है।
इसी कड़ी में ब्लॉक कृषि अधिकारी डॉ. भूपिंदर सिंह की अगुवाई में डॉ. यादविंदर सिंह द्वारा विभिन्न गांवों का दौरा किया गया। किसानों से बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि दालें मानव आहार का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इनमें सर्वाधिक प्रोटीन पाया जाता है। पंजाब में सामान्यतः किसान गेहूं-धान फसल चक्र अपनाते हैं, जिसके कारण दालों के अधीन क्षेत्रफल बहुत कम हो गया है।
उन्होंने बताया कि ग्रीष्मकालीन मूंग कम अवधि में तैयार होने वाली एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। इसकी खेती करके किसान जहां अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं, वहीं भूमि की सेहत में भी सुधार कर सकते हैं तथा खाली पड़ी जमीन का बेहतर उपयोग कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि मूंग की फसल अन्य दालों की अपेक्षा अधिक गर्मी सहन कर सकती है, इसलिए इसकी खेती के लिए गर्म जलवायु उपयुक्त है। इसकी बुवाई के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट से लेकर रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त मानी जाती है। मूंग की खेती के लिए चार किस्में— एस.एम.एल. 1827, एस.एम.एल. 832, एस.एम.एल. 668 और टी.एम.बी. 37 — की सिफारिश की गई है। ये किस्में 60 से 65 दिनों में पक जाती हैं और औसतन 4 से 5 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन देती हैं।
मूंग की बुवाई 20 मार्च से अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक की जा सकती है। बुवाई से पहले बीज को फफूंदनाशक या जैविक विधि से उपचारित करना चाहिए, जिससे उत्पादन बढ़ता है और रोगों से बचाव होता है। गेहूं की कटाई के बाद खेत की जुताई किए बिना जीरो टिल ड्रिल या हैप्पी सीडर से भी मूंग की बुवाई की जा सकती है। बुवाई के समय 11 किलोग्राम यूरिया और 100 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट प्रति एकड़ डालना चाहिए। हालांकि, आलू की खुदाई के बाद बिना किसी अतिरिक्त खाद के भी मूंग की खेती की जा सकती है।
निराई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के दो दिनों के भीतर 1 लीटर पेंडीमेथालिन 30 ई.सी. को 150-200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है। मौसम और भूमि की किस्म के अनुसार मूंग की फसल को 3 से 5 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।
मूंग की फसल पर सामान्यतः थ्रिप्स और फली छेदक सुंडी का प्रकोप होता है, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। इनके नियंत्रण के लिए 600 मिलीलीटर ट्रायजोफॉस 40 ई.सी. या 100 मिलीलीटर डाइमेथोएट को 80-100 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दालों की खेती से प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर पानी की बचत के साथ-साथ भूमि की उर्वरता में भी सुधार किया जा सकता है।
इस अवसर पर सुखदेव सिंह, कमलजीत कौर (सहायक टेक्नोलॉजी मैनेजर), बलराज सिंह, हरदयाल सिंह तथा गांव के प्रगतिशील किसान भी उपस्थित थे।

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