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मनुष्य के जीवन को सही दिशा प्रदान करता है अध्यापक

कल्याण केसरी न्यूज़ अमृतसर,3 सितम्बर : 5 सितम्बर अध्यापक दिवस पर विशेष इंसान जन्म से ले कर मरने तक किसी न किसी से कुछ न कुछ सीखता ही रहता है। माता पिता की तरफ से दिए गए संस्कारों के साथ मनुष्य चलना सिख लेता है परंतु मनुष्य के जीवन में एक अध्यापक की तरफ से दी गई शिक्षा ही मनुष्य के जीवन को एक नयी दिशा प्रदान करता है, जिसके अधार पर वह मंजिल दर मंजिल तय करता चला जाता है। स्कूल और कालेज का समय जि़ंदगी का एक ऐसा समय होता है, जिस में मनुष्य की जि़ंदगी की नींव तैयार होती है, जिस पर इमारत किस तरह की बनेगी, इमारत बनेगी भी या नहीं या इस पर एक दीवार का निर्माण भी नहीं हो सकेगा इस का जवाब आने वाले समय की गोद में समाया होता है। बुर्जुगों के पास से एक बात आम ही सुनते हैं कि जब नींव मज़बूत होती है तो ही उस पर एक मज़बूत महिल खड़ा किया जा सकता है। इसी तरह ही स्कूल और कालेज के बीच वाला समय ही जि़ंदगी को कच्चा या पक्का करता है, इस में एक अध्यापक का भूमिका बेहद अहम होती है। बेशक अध्यापक के पास बच्चे परिवार की अपेक्षा कम समय ही गुज़ारते हैं परन्तु अध्यापक की आँख बच्चों के हुनर, कला, काबलियत को पहचान कर उसको सही मार्ग प्रदान करता है, क्योंकि जिस तरह के साथ एक हीरे की परख केवल और केवल जौहरी ही कर सकता है, इसी तरह बच्चों में कौन सा हुनर है या बच्चों में कौन सी कला है, क्या गुण हैं जिसको ओर तराश कर सुंदरता प्रदान की जा सकती है। जब बच्चा अध्यापक के पास पढऩे के लिए आता है, वह कच्ची मिट्टी की तरह होता है, उस बच्चे को अध्यापक एक मिट्टी के बर्तन बनाने वाले की तरह उसको पहले देखता है, परखता है, इसको कौन सा रूप दिया जा सकता है, इसके बारे में सोच विचार करता है, सोच विचार करके एक ढांचे  में बच्चे को डालने की कोशिश करता है जिससे उसको एक रूप, दिखावट, रंगत मिल सके। बच्चे को अध्यापक प्यार भी करता है के साथ डांटदा भी है, जिससे बच्चो की जि़ंदगी में निखार आ सके। जिस तरह एक घुमेहार जब मिट्टी के बर्तन तैयार करता है तो वह उसको तैयार करते समय बाहर से उसको थपथपाता और धक्के मारता है साथ साथ अंदर से एक हाथ के साथ संभालता भी है, कहीं बर्तन टूट न जाये। इसी तरह अध्यापक बच्चे को डांट साथ साथ प्यार भी करता है जिससें बच्चों का आने वाला भविष्य सुंदर बन सके। अध्यापक का बच्चों के साथ और बच्चों का अध्यापक के साथ एक अलग ही रिश्ता होता है। अध्यापक के पास हर जाति का बच्चा पढऩे के लिए आता है, वह हर किसी को एक ही सी शिक्षा देता है और वह किसी के साथ भेदभाव नहीं करता।

अध्यापक समाज में एक ऐसा किरदार होता है, जिसका जो बच्चा प्यार, सत्कार, सम्मान करता है, अध्यापक उस बच्चे  की आने वाली जि़ंदगी में इसतरह का मार्ग दर्शन करता है कि उस बच्चे को प्यार, सत्कार और सम्मान कई गुणा अधिक कर मिलता है। जो बच्चे अध्यापक का मान सत्कार नहीं करते, अध्यापक के ज्ञान के खजाने को तो कुछ फर्क नहीं पड़ता पर बच्चे के पैर ऐेसे रास्तों पर चल पड़़ते है जिन रास्तों पर अंधेरों, धक्कों के सिवाए कुछ नहीं होता। फिर पछताने के सिवाए कुछ नहीं होता। उसके पीछे कारण यह है कि परिवारों की जायदादों को तो कोर्टों कचहरियों में जा कर हासिल किया जा सकता है परंतु विद्या जैसे कीमती ज्ञान को पढ़ाने वाले अध्यापक एक ऐसी दौलत के मालिक होते हैं कि जिसको दुनिया की किसी भी ताकत, पैसे और धक्केशाही के साथ हासिल नहीं किया जा सकता। इस विद्या को हासिल करने के लिए अध्यापक का मान सम्मान, विद्या की पूजा करनी ही पड़ती है तभी जाकर यह विद्या का अनमोल खज़़ाना मिलता है। विद्या के अनमोल खजाने की अध्यापक चाबी होता है, जिसके बिना विद्या का अनमोल खज़़ाना कभी भी नहीं मिल सकता है। विद्या के खजाने साथ दुनिया के सभी खज़ानों को हासिल किया जा सकता है, परन्तु यह विद्या का खज़़ाना जिसके पास नहीं है तो दुनिया के बाकी सभी दुनियाबी खजाने भी मिटी के बराबर होते हैं। दुनियाबी खजाने आपको थोड़ा समय की शौहरत मिल सकती है परन्तु असली रुतबा केवल और केवल विद्या से ही मिलता है।

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