हकदारी से परिणामों तक: मनरेगा के स्थान पर वीबीजीआरएएम-जी से बदलने का मामला


(लेखकः निरवा मेहता)
सरकारी नीतियों का मूल्यांकन भावनाओं, राजनीतिक प्रतीकों या अतीत की स्मृतियों से नहीं, बल्कि उनके वास्तविक परिणामों से होना चाहिए। ग्रामीण रोजगार और आजीविका से जुड़ी भारत की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक मनरेगा अब विकसित भारत गारंटी मिशन–ग्रामीण अधिनियम, 2025 (वीबीजीआरएएम-जी) के अंतर्गत पुनर्गठित की जा रही है। इस बदलाव को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन हुए हैं और आलोचकों ने इसे राज्यों के अधिकारों में कटौती, सत्ता के केंद्रीकरण और महात्मा गांधी की विरासत को कमजोर करने वाला कदम बताया है। किंतु यह विरोध अधिकतर नीति की मूल भावना को समझने के बजाय राजनीतिक आख्यानों पर आधारित है।
वीबीजीआरएएम-जी के खिलाफ सबसे प्रमुख तर्क यह दिया जा रहा है कि यह अधिकार-आधारित ढांचे को समाप्त कर देता है। यह धारणा इस विश्वास पर टिकी है कि केवल ‘अधिकार’ अपने आप में सशक्तिकरण का माध्यम बन जाता है। जबकि मनरेगा के दो दशकों के अनुभव ने इस धारणा की सीमाओं को उजागर किया है। मजदूरी भुगतान में लगातार देरी, अपूर्ण मांग, कम गुणवत्ता वाली परिसंपत्तियों का निर्माण और राज्यों में असमान क्रियान्वयन ने इस अधिकार को व्यावहारिक रूप से कमजोर कर दिया। जो अधिकार समय पर, बड़े पैमाने पर और निरंतर लागू न हो सके, वह व्यवहार में अधिकार नहीं रह जाता।
राज्य की जिम्मेदारी को कम करने के बजाय, वीबीजीआरएएम-जी उसे पुनः परिभाषित करता है। यह अधिनियम समयबद्धता को लागू करता है, वित्त पोषण को परिणामों से जोड़ता है और जवाबदेही को संस्थागत स्वरूप देता है। इसे कमजोरी नहीं, बल्कि एक आवश्यक सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए।
मूल रूप से यह नया कानून भारत की विकास सोच में एक निर्णायक परिवर्तन को दर्शाता है। मनरेगा को ग्रामीण संकट के समय राहत उपाय के रूप में तैयार किया गया था। किंतु संकटग्रस्त रोजगार को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थायी स्थिति मान लेना समस्या को सामान्य बना देता है। वीबीजीआरएएम-जी अल्पकालिक रोजगार सृजन से आगे बढ़कर आजीविका निर्माण, कौशल विकास और उत्पादक परिसंपत्तियों के सृजन पर जोर देता है। कार्यदिवसों की संख्या से आगे बढ़कर स्थायी आय, उत्पादकता और सामाजिक उन्नति को लक्ष्य बनाना समय की मांग है। केवल रोजगार नहीं, बल्कि आय की स्थिरता और आगे बढ़ने की क्षमता ही वास्तविक सम्मान देती है।
राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ को लेकर उठाई जा रही आशंकाओं की भी गहन समीक्षा आवश्यक है। पुराने ढांचे में राज्यों को केंद्रीय अनुदानों में देरी, अनियोजित देनदारियों और व्यय साझा करने को लेकर निरंतर अनिश्चितता का सामना करना पड़ता था। वीबीजीआरएएम-जी स्पष्ट वित्तीय भूमिकाएं, मध्यावधि योजना और परिणाम-आधारित वित्त पोषण सुनिश्चित करता है। पूर्वानुमेयता ही वास्तविक राजकोषीय संघवाद की आधारशिला है, जो राज्यों को तात्कालिक संकट प्रबंधन के बजाय दीर्घकालिक योजना बनाने की क्षमता देती है।
अति-केंद्रीकरण के आरोप भी राष्ट्रीय मानकों और सूक्ष्म-प्रबंधन के बीच अंतर को नजरअंदाज करते हैं। इतने बड़े पैमाने की योजना में पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी के लिए समान मानक अनिवार्य हैं। स्थानीय निकायों की भूमिका कार्यों की पहचान, कार्यान्वयन और निगरानी में बनी रहती है। अंतर केवल इतना है कि अब प्रदर्शन और जवाबदेही पर अधिक जोर है। इतिहास गवाह है कि बिना निगरानी के विकेंद्रीकरण का लाभ अक्सर बिचौलियों को मिला है, श्रमिकों को नहीं। वीबीजीआरएएम-जी इसी संरचनात्मक दोष को सुधारने का प्रयास करता है।
सबसे भावनात्मक आपत्ति इस कानून से महात्मा गांधी का नाम हटाए जाने को लेकर है। किंतु यह तर्क प्रतीकवाद को नीति के वास्तविक उद्देश्य से ऊपर रख देता है। गांधी के आर्थिक दर्शन का मूल आधार उत्पादक श्रम, आत्मनिर्भरता, विकेंद्रीकृत विकास और नैतिक जिम्मेदारी था। अक्षमता से ग्रस्त व्यवस्था को उनका नाम देना उनकी विरासत का सम्मान नहीं करता। इसके विपरीत, स्थायी सामुदायिक परिसंपत्तियों, स्थानीय उद्यम और आजीविका की स्थिरता पर केंद्रित कार्यक्रम गांधीवादी सोच के अधिक निकट है।
सुधार स्वाभाविक रूप से प्रतिरोध को जन्म देते हैं, विशेषकर तब जब वे स्थापित राजनीतिक कथाओं को चुनौती देते हैं। किंतु सामाजिक नीति का मूल्यांकन समय के साथ किया जाना चाहिए। भारत की जनसांख्यिकीय चुनौतियों, वित्तीय सीमाओं और विकासात्मक आकांक्षाओं के संदर्भ में ऐसे ढांचे की आवश्यकता है जो मापने योग्य और टिकाऊ परिणाम दे सके। वीबीजीआरएएम-जी ग्रामीण रोजगार नीति को इनपुट-आधारित पात्रता से परिणाम-उन्मुख गारंटी की दिशा में ले जाता है।
नीति निर्माताओं के सामने वास्तविक विकल्प करुणा बनाम दक्षता या अधिकार बनाम सुधार का नहीं है। विकल्प है—बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप ढलने वाली कल्याणकारी संरचना और उन पुरानी व्यवस्थाओं के बीच, जिनकी सीमाएं समय के साथ उजागर हो चुकी हैं। वीबीजीआरएएम-जी इसी विकासशील सोच का संकेत है, जो सार्वजनिक व्यय को स्थायी ग्रामीण समृद्धि में बदलने का प्रयास करता है। राष्ट्रीय बहस को राजनीतिक पुरानी यादों के बजाय इसी महत्वाकांक्षा पर केंद्रित होना चाहिए।
निरवा मेहता राजनीतिक विश्लेषक हैं और सरकारी नीति, शासन तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर नियमित रूप से लिखते हैं। उनका लेखन भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सत्ता संरचनाओं, राज्य व्यवहार और नीतिगत विकल्पों के दीर्घकालिक प्रभावों पर केंद्रित है।

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