हाल के दिनों में ईरान और अमेरिका/इज़राइल के बीच मिलिट्री तनाव तेज हो गया है, जिससे तेल आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर दबाव बढ़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “गंभीर चिंता” का विषय बताया है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। इस संघर्ष का असर सीधे तेल की कीमतों पर भी पड़ा है, जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
तेल की कीमतों पर असर
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है| हाल के संघर्षों से ब्रेंट क्रूड की कीमत 8% बढ़कर लगभग $82 प्रति बैरल हो गई है। हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से कच्चे तेल की कीमतें भारत के चालू खाते के घाटे को जीडीपी के अनुपात में लगभग 0.5 प्रतिशत तक बढ़ा देती हैं। महंगे तेल से घरेलू मुद्रास्फीति में करीब 0.35% की बढ़ोतरी हो सकती है और GDP विकास दर पर भी असर पड़ सकता है।
इन आंकड़ों से साफ है कि तेल की बढ़ती कीमतें भारत पर आर्थिक बोझ बढ़ा रही हैं। महंगा तेल आयात करने से चालू खाता घाटा और मुद्रास्फीति दोनों बढ़ते हैं, जिससे आम व्यक्ति की जेब पर असर पड़ेगा।
व्यापार और रेमिटेंस पर प्रभाव
भारत के पश्चिम एशिया के साथ गहरे आर्थिक संबंध हैं, इस क्षेत्र की अस्थिरता से व्यापार और प्रवासी रेमिटेंस पर असर पड़ेगा । भारत के कुल निर्यात का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र में जाता है। वहीं, भारत को मिलने वाले कुल कच्चे तेल का करीब 55 प्रतिशत यहीं से आता है। इसके अलावा, विदेशों से आने वाली कुल कामगार रेमिटेंस (प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी गई रकम) का लगभग 38 प्रतिशत भी इसी क्षेत्र से प्राप्त होता है। पश्चिम एशिया में लगभग एक करोड़ भारतीय काम कर रहे हैं, जिनमें से बहुत से लोग परिवार को पैसे भेजते हैं। इनमें मुख्य संख्या, यूएई: करीब 35 लाख, सऊदी अरब: करीब 27 लाख | इसके अलावा कुवैत में 10 लाख, कतर में 8 लाख, ओमान में 6.6 लाख, बहरीन में 3.5 लाख भारतीय रहते हैं।
इससे स्पष्ट है कि यदि इस क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है, तो उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ये प्रवासी भारतीय भारत के लिए बड़ी मुद्रा भेजते हैं। उदाहरण के लिए, 2023–24 में केवल संयुक्त अरब अमीरात से ही भारत को कुल रेमिटेंस का लगभग 19 प्रतिशत प्राप्त हुआ था। अगर मध्य-पूर्व में संघर्ष लंबा चला, तो इन देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर हो सकती है और भारतीय प्रवासियों की आमदनी तथा भेजे जाने वाले पैसों में कमी आ सकती है। इससे घरेलू भीति परिवारों की आमदनी घटेगी और भारत में विदेशी मुद्रा के प्रवाह पर असर पड़ेगा। ये आंकड़े बताते हैं कि मध्य-पूर्व संकट भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कितना महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया भर का करीब एक-तिहाई तेल गुज़रता है। इस मार्ग पर तनाव होने की स्थिति में जहाजों का संचालन बाधित हो सकता है, जिससे भारत को ऊर्जा आपूर्ति में दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है।
राजनैतिक और सरकारी प्रतिक्रिया
भारत ने इस संकट को बहुत गंभीरता से देखा है। प्रधानमंत्री मोदी ने सभी पक्षों से कूटनीतिक रास्ते से समाधान की अपील की है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरान और इज़राइल दोनों से बातचीत कर भारतीय हितों की रक्षा पर बल दिया है। पेट्रोलियम मंत्री ने कहा है कि तेल और गैस की उपलब्धता और किफायती कीमतों को सुनिश्चित करने के लिए सभी कदम उठाए जा रहे हैं। इसके अलावा, वाणिज्य मंत्रालय ने निर्यात-आयात पर प्रभाव का आकलन करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की है। इन सबके मद्देनजर, मध्य-पूर्व में किसी लंबे संघर्ष से भारत की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर हो सकता है। तेज बढ़ती तेल की कीमतों, घटते व्यापार और रेमिटेंस से चालू खाता घाटा, महंगाई और विकास दर प्रभावित हो सकते हैं।
भारत के दृष्टिकोण से, ईरान के बजाय इज़राइल और अमेरिका का साथ देना एक व्यावहारिक कदम लगता है, क्योंकि लंबे समय में उनके ही जीतने की संभावना अधिक है। यदि अमेरिका ईरान और वेनेजुएला के तेल व्यापार को नियंत्रित करने की शक्ति रखता है, तो भारत के लिए यह समझदारी है कि वह अमेरिका के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाए रखे। इस संदर्भ में, भारत ने जिस तरह से ईरान के पड़ोसी देशों के साथ अपनी सक्रियता बढ़ाई है, वह एक उचित कूटनीतिक कदम है। इससे साफ है कि भारत अपनी जरूरतों और हितों को सर्वोपरि रख रहा है। सीधा संदेश यह है कि भारत अब किसी एक गुट के भरोसे बैठने के बजाय, वहां हाथ मिला रहा है जहां उसके नागरिकों और विकास का हित सुरक्षित हो।
डॉ. प्रशांत कुमार चौधरी,
सहायक प्राध्यापक,
लोक नीति विभाग मणिपाल अकादमी ऑफ हायर एजुकेशन, बेंगलुरु
पलक गुलेरिया,
पीएच.डी. sशोधार्थी,
लोक नीति विभाग, मणिपाल अकादमी ऑफ हायर एजुकेशन, बेंगलुरु

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