
कल्याण केसरी न्यूज़, अमृतसर, 12 अप्रैल 2026: श्री दरबार साहिब, अमृतसर के घंटाघर द्वार के बाहर थोड़ी दूरी पर स्थित एक स्थान, जिसे जलियांवाला बाग के नाम से जाना जाता है, देश के इतिहास में विशेष स्थान रखता है। कभी यह इलाका भाई हमीत सिंह की संपत्ति हुआ करता था। हमीत सिंह, राजा जसवंत सिंह नाभा के महाराजा रणजीत सिंह की सेवा में वकील थे।
जल्ला गांव, जिला फतेहगढ़ साहिब की सरहिंद तहसील में, फतेहगढ़ साहिब से 14 किलोमीटर दूर सरहिंद-भादसों सड़क पर स्थित है। इस गांव को महाराजा पटियाला के पुरोहित पंडित जल्ले ने बसाया था। इस गांव की जागीर सरदार हिम्मत सिंह को मिली थी, जो होशियारपुर के गांव माहलपुर के चौधरी गुलाब राय बैंस जाट के पुत्र थे। सिख मिसलों के उत्कर्ष काल में सरहिंद पर की गई कार्रवाई में भाग लेने के कारण उन्हें यह गांव जागीर के रूप में मिला। इसके बाद वे सरदार हिम्मत सिंह जलेवाले कहलाने लगे।
गांव में बसने के बाद सरदार हिम्मत सिंह नाभा रियासत में सेवाएं देने लगे। सन 1812 में महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें अपनी सेवा में शामिल कर लिया। इन सेवाओं के बदले उन्हें जालंधर का गांव अलावलपुर और अमृतसर में बाग वाली जमीन इनाम में दी गई। इसी स्थान पर उन्होंने बाग लगवाया, जो जलेवालों का बाग कहलाया। उनकी मृत्यु के बाद यह संपत्ति उनके चार पुत्रों में बांट दी गई।

13 अप्रैल 1919 की खूनी बैसाखी के दिन यह स्थान केवल नाम का ही बाग था। यहां एक समाधि, एक कुआं और बाकी खुला मैदान था।
इतिहासकार लेपल ग्रिफिन की पुस्तक चीफ्स एंड फैमिलिज़ ऑफ नोट इन पंजाब (1890) सहित भाषा विभाग पंजाब के पंजाबी कोश, डॉ. रतन सिंह जग्गी का सिख पंथ विश्वकोश, पंजाबी यूनिवर्सिटी का सिख धर्म विश्वकोश और प्रो. पियारा सिंह पद्म की पुस्तक संक्षेप सिख इतिहास (1469–1979) में भी इस बाग का उल्लेख मिलता है।
पृथीपाल सिंह कपूर अपनी पुस्तक पंजाब में स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख धाराएं में लिखते हैं कि वास्तव में जलियांवाला बाग कूड़ा-कचरा डालने की जगह था। यह शहर के बीचों-बीच एक नीची, असमतल और चारों ओर से दीवारों व घरों से घिरी हुई जगह थी। इसमें कुछ संकरे रास्ते थे और अंदर एक पुरानी समाधि, टूटी हुई संरचनाएं और एक परित्यक्त कुआं था।
1919 की बैसाखी पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्री दरबार साहिब पहुंचे हुए थे। उसी दिन जलियांवाला बाग में अंग्रेजी हुकूमत के काले कानूनों के खिलाफ एक सभा आयोजित की गई। जनरल डायर को इसकी सूचना मिली और उसने इसे अपनी सत्ता के लिए चुनौती माना।
ब्रिटिश अधिकारियों ने पहले ही अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया था और जनसभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बावजूद लोग इकट्ठा हुए।
जनरल डायर लगभग 90 सैनिकों के साथ बाग में पहुंचा। उसके साथ बख्तरबंद गाड़ियां और मशीनगनें भी थीं। शाम करीब 5:15 बजे वह बाग के संकरे प्रवेश द्वार तक पहुंचा और बिना किसी चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया।
करीब 10 मिनट तक लगातार गोलीबारी हुई, जिसमें 1650 गोलियां चलाई गईं। लोग भागने की कोशिश करते रहे, लेकिन चारों ओर से घिरे होने के कारण बच नहीं सके। कई लोग जान बचाने के लिए कुएं में कूद गए।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 379 लोग मारे गए और 1200 से अधिक घायल हुए, जबकि अन्य स्रोतों के अनुसार मृतकों की संख्या 1000 के करीब थी। मृतकों में बच्चे भी शामिल थे, जिनमें एक 7 महीने का शिशु भी था।
इस नरसंहार का बदला शहीद ऊधम सिंह ने 21 वर्ष बाद 13 मार्च 1940 को लिया। उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल में माइकल ओ’डायर को गोली मार दी।
दिसंबर 1919 में अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसमें जलियांवाला बाग के शहीदों की स्मृति में स्मारक बनाने का प्रस्ताव रखा गया। महात्मा गांधी ने इसके लिए भूमि खरीदने और स्मारक बनाने हेतु धन एकत्र करने की मुहिम चलाई।
1923 में यह भूमि खरीदी गई और बाद में यहां शहीदों की स्मृति में एक भव्य स्मारक बनाया गया।
आज जलियांवाला बाग भारत के इतिहास का वह दर्दनाक अध्याय है, जो ब्रिटिश शासन की क्रूरता और भारतीयों के बलिदान की गाथा को सदा के लिए जीवित रखता है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक यहां पहुंचकर उस त्रासदी को महसूस करते हैं।
यह स्थान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमिट और भावनात्मक महत्व रखता है।

Kalyan Kesari हिन्दी समाचार पत्र