दास भावना और निष्काम सेवा से ही गुरसिख का जीवन सार्थक एवं आनंदमयी होता है


कल्याण केसरी न्यूज़, चंडीगढ़, 28 सितंबर 2026: सच्चा गुरसिख वही है जो हर पल, हर श्वास सतगुरु का दास बनकर रहता है और बिना किसी किंतु-परंतु के वही कार्य करता है जो सतगुरु उसे कहते हैं। गुरसिख चाहे कितना भी सयाना, विद्वान या धन-दौलत वाला क्यों न हो, वह अपनी चतुराई और धन का मान नहीं करता, बल्कि गुरु के दर पर आकर अपने “मैं” और अहंकार को पूरी तरह मिटा देता है। वह जो कुछ भी सतगुरु से सुनता है उसे सहर्ष स्वीकार करता है और सतगुरु की रज़ा में ही अपनी भलाई समझता है। ऐसा गुरसिख किसी फल की इच्छा नहीं रखता तथा सदैव निष्काम भाव से सेवा, सुमिरन और सत्संग करता है। ऐसी दास भावना वाले गुरसिख का सतगुरु स्वयं मान बढ़ाता है और उसके पूरे वंश का नाम रोशन करता है। वास्तव में, ऐसे गुरसिख का ही जीवन सार्थक और आनंदमय होता है।
ये उद्गार आज यहां सेक्टर 30 स्थित संत निरंकारी सत्संग भवन में आयोजित साप्ताहिक सत्संग में अमृतसर से पधारे प्रचारक श्री परमजीत सिंह मोमन जी ने हजारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
श्री मोमन ने चांदी के शुद्धिकरण का उदाहरण देते हुए कहा कि जब तक चांदी में उबाल रहता है तब तक वह शुद्ध नहीं होती, और जब उसमें अपना प्रतिबिंब दिखने लगे तो समझना चाहिए कि वह शुद्ध हो गई है। इसी प्रकार जब तक हमारा मन दूसरों की कमियां गिनता रहता है तब तक वह शुद्ध नहीं है, परंतु जब हर गुरसिख में सतगुरु का रूप नजर आने लगे तो समझना चाहिए कि दास भावना शुरू हो गई है। उन्होंने कहा कि सच्चा ज्ञान वह नहीं जिसे बोझ की तरह कंधे पर उठाकर चलना पड़े, बल्कि वह है जो जीवन को आसान और सुखमय बना दे।
एक बादशाह और दो बाज़ों की कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि जो बाज़ बार-बार एक ही टहनी पर आकर बैठ जाता था, वह तभी ऊंची उड़ान भर सका जब वह टहनी काट दी गई। इसी प्रकार “मैं करूंगा तभी ठीक होगा” यह अहंकार हमारे मन की टहनी है, जिसके कटते ही मनुष्य आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छू सकता है। उन्होंने कहा कि हमें कर्ता बनकर नहीं बल्कि दास बनकर कार्य करना है, क्योंकि फैसला करने का अधिकार हमारा नहीं, केवल कर्म करने का है।
द्रौपदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब तक द्रौपदी को अपने पतियों और परिवार के अन्य सदस्यों के बल पर भरोसा रहा, बात नहीं बनी, परंतु जैसे ही उसने हाथ जोड़कर प्रभु का ध्यान किया, उसकी लाज बच गई। जिस प्रकार मां पालने में सोए नादान बच्चे के रोने की आवाज सुनते ही सारे काम छोड़कर उसे गोद में उठा लेती है, उसी प्रकार जो भक्त स्वयं को सयाना न मानकर पूर्ण रूप से निरंकार पर निर्भर हो जाता है, प्रभु स्वयं उसे अपना लेता है। उन्होंने कहा कि यह परमपिता परमात्मा ही सबका आधार है और इसके बिना कुछ भी टिक नहीं सकता।
भाव और भक्ति को एक-दूसरे से जुड़ा बताते हुए श्री मोमन जी ने कहा कि सत्संग भवन में प्रवेश करते समय हमारे मन की अवस्था एक याचक की होनी चाहिए। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के वचनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब हमें अपने आगे-पीछे बैठे हर महात्मा में यही प्रभु नजर आने लगे, तभी सच्ची भक्ति की शुरुआत होती है। उन्होंने कहा कि आंख और कान मन के प्रवेश द्वार हैं, इसलिए इन्हें गुरु की दृष्टि से दुरुस्त करें ताकि वे सबमें एक ही परमात्मा को देखें-सुनें और निंदा-चुगली से दूर रहें। उन्होंने कहा कि जीवन का असली रस और आनंद इसी दास भावना और भक्ति में है। अंत में उन्होंने सतगुरु से यही अरदास की कि सबको अपनी शरण और अपने चरणों से जोड़े रखें।
इससे पूर्व स्थानीय संयोजक श्री नवनीत पाठक जी ने अमृतसर से आए श्री परमजीत सिंह जी मोमन का सारी साधसंगत की ओर से धन्यवाद व स्वागत किया गया।

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